Friday 21 October 2011

दिमाग़ कहता है छोड़ो, पर मन नहीं मानता.


दोस्ती का सिला हमे मिला है, 
अब ना किसी से शिकवा ना गिला है. 
मोहब्बत का खंजर तो सीने पे लगा था,
मगर दोस्ती का खंजर तो मेरी पीठ पर मिला है. 
आज दुनिया से कुछ कहने को बचा नही.,
इस दुनिया में कहीं भी वफ़ा नही.
हम रोते रोते थक गये इस दुनिया के सामने, 
आज आँसू पोछनें का बहाना मिला है. 
लोग आते हैं जाते हैं मगर ज़िंदगी रुकती नही है, 
आज इस दिल की प्यास पानी से बुझती नही है. 
भरोसा तोड़ने वाले तो बहुत हैं दुनिया में, 
मगर भरोसा बेचने वाले पहली बार मिलें हैं.
ज़िंदगी में जिनपे भरोसा किया उन्हीं ने दिल के टुकड़े किए,
मगर शायद यही मेरी सज़ा है बिना सोचे समझे जो उनको अपने दिल दिए.
महीनों गुज़र गये उनसे हमारी बात हुई,
लेकिन दिल अब भी दिल नही मानता की हमारी दोस्ती ख़त्म हुई.

प्यार छोड़े तब उतना फ़र्क नही पड़ता जितना दोस्त छूटने पे दर्द होता है,
दिमाग़ कहता है छोड़ो इन बातों को, पर मन नहीं मानता. आख़िर दोस्त से भी तो प्यार होता है.

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